जगजीवन की खुराक – जीवन के चौथे स्तंभ का संतुलन!
- 4 minutes read - 767 wordsमेरे पिछले लेखों में मैंने 📕 जगजीवन: जीवन से बढ़कर जीना से कुछ जीवन की खुराक साझा की थीं। हमने बात की थी — नियमित रूप से मिलते रहने की, रिश्तों को जीवित रखने की, और अवसरों का इंतज़ार करने के बजाय मिलने के अवसर स्वयं बनाने की। चाहे परिवार हो या कॉलेज रीयूनियन — साथ रहना ही जीवन की असली ऊर्जा है।
एक अन्य लेख में मैंने ICU से मिली जीवन की सीख साझा की थी — जहाँ जीवन की अस्थिरता हमें उसकी वास्तविक कीमत समझाती है।

इस बार मैं एक नई जगजीवन की खुराक साझा करना चाहता हूँ — राजस्थान के सालासर बालाजी मंदिर की मेरी हालिया यात्रा, परिवार से मिलन, और अपनों को जगजीवन की हस्ताक्षरित प्रतियाँ भेंट करने के अनुभव से जुड़ी हुई।
जगजीवन की खुराक: जीवन के चौथे स्तंभ का संतुलन
यह विचार मेरी पुस्तक 📕 जगजीवन: जीवन से बढ़कर जीना अध्याय 6 — “मिलकर बढ़ो, साथ बढ़ो” से प्रेरित है।
मेरे पड़नाना श्री जग्गूराम जी जीवन को चार स्तंभों में समझाते थे। समय के साथ हम स्वाभाविक रूप से बढ़ते हैं —
- शारीरिक रूप से
- मानसिक रूप से
- आर्थिक रूप से
लेकिन एक चौथा स्तंभ अक्सर अनदेखा रह जाता है — आध्यात्मिक विकास।

यदि यह स्तंभ कमजोर हो जाए, तो बाकी तीनों का संतुलन भी बिगड़ जाता है। सच्ची प्रगति वही है जो हमें भीतर से भी विकसित करे।
एक यात्रा जिसने फिर याद दिलाया
बचपन से ही सालासर बालाजी जाना मेरे जीवन का हिस्सा रहा है। हनुमान जी के दर्शन हमेशा मन को स्थिरता और ऊर्जा देते हैं। इस बार की यात्रा ने फिर से जग्गूराम जी की सीख को जीवंत कर दिया।
काफी समय बाद जयपुर जाना हुआ, और परिवार ने इस अवसर को एक यादगार मिलन में बदल दिया। रिसॉर्ट में सब इकट्ठा हुए — और जैसे प्रकृति भी साथ दे रही थी। रेगिस्तान में बारिश अपने आप में एक उत्सव होती है।
ठंडी हवा, सुहावना मौसम, बच्चों की हँसी और खुला आसमान — हमने क्रिकेट खेला, बातें कीं, और जॉबनेर में बहन के घर स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया।
अगले दिन सालासर की यात्रा बेहद सुखद रही। रेगिस्तान की खुशबू भरी हवा, बच्चों की ATV राइड, और परिवार के साथ बिताए पल —
ये केवल यात्रा नहीं थे, बल्कि जीवन की जमा पूँजी थे।
जगजीवन भेंट करने का भावुक क्षण
इस यात्रा के दौरान मुझे अपने प्रियजनों को जगजीवन की हस्ताक्षरित प्रतियाँ देने का अवसर मिला — डॉ. पवन बसनीवाल और उनके परिवार सहित कई रिश्तेदारों से मिलना अत्यंत सुखद रहा।
एक क्षण विशेष रूप से भावुक कर गया। मैं अपनी उस आंटी से मिला जिनके घर मैं कॉलेज इंटर्नशिप के दौरान दो महीने किरायदार के रूप में रहा था। उन्होंने मुझे अपने बेटे की तरह संभाला था। मैं उन्हें हमेशा माँ समान मानता हूँ।

दस वर्षों से अधिक समय बाद उनसे मिलना हुआ… और तब पता चला कि अंकल अब इस दुनिया में नहीं हैं — और मुझे इसकी जानकारी भी नहीं थी। मैंने जैसे तैसे अपने आप को संभाला पर उस पल ने भीतर तक झकझोर दिया।
जीवन प्रतीक्षा नहीं करता। समय लौटकर नहीं आता। हम सब यहाँ सीमित समय के लिए हैं।
यही जगजीवन की सबसे गहरी सीख है —
मिलते रहो। जुड़े रहो। प्रेम को टालो मत।
जगजीवन की खुराक हमें याद दिलाती है कि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं है — बल्कि रिश्तों, कृतज्ञता और संतुलन का नाम है।
जब जीवन का चौथा स्तंभ — आध्यात्मिकता — मजबूत होता है, तभी बाकी तीन स्तंभ भी स्थिर रहते हैं।
जगजीवन के बारें में
📕 जगजीवन: जीवन से बढ़कर जीना एक भावनात्मक और प्रेरणादायक पुस्तक है, जो श्री जग्गूराम जैसे दूरदर्शी, सरल और गहन विचारों वाले व्यक्तित्व के जीवन-सार को संजोती है। उनके आशीर्वाद, मूल्यों और जीवन-दृष्टि ने कई पीढ़ियों को आकार दिया है, और आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।

लेखक ने अपने बचपन की स्मृतियों को मिलाकर इस महान व्यक्तित्व की सीखों को दस अध्यायों में समाहित किया है। इन अध्यायों में जीवन की असली विरासत, जिम्मेदारियों का महत्व, उतार-चढ़ाव से जूझने की शक्ति, हुनर का मूल्य, छिपी क्षमताएँ, पारिवारिक जुड़ाव, संघर्ष समाधान, अनुशासन, कर्म की शक्ति और उच्च मूल्यों के साथ जीवन के समापन जैसी महत्वपूर्ण बातों को सरल, प्रेरक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
यह पुस्तक सिर्फ एक जीवनी नहीं—जीवन जीने की कला का सहज, व्यावहारिक मार्गदर्शन है। यह पाठकों को जीवन की सरलता में महानता खोजने, रिश्तों को संवारने, और अपने कर्मों से जीवन को ‘जीवन से बड़ा’ बनाने की प्रेरणा देती है।
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